कौन लाएगा बंगाल में सुशासन

कौन लाएगा बंगाल में सुशासन

जब षक्ति को वैधानिक मिलती है तो वह सत्ता में बदल जाती है। यही एक बड़ी वजह रही है कि राजनीतिक दल षक्ति प्रदर्षन के मामले में न पीछे हटते हैं और न ही किसी अन्य के डटे रहने को बर्दाष्त करते हैं। मौजूदा समय में यह बात पष्चिम बंगाल में पुख्ता होते हुए देखी जा सकती है। दरअसल राजनीति के अपने स्कूल होते हैं जिसका अभिप्राय विचारधारा से है और इन्हीं के चलते राजनीतिक संगठनों का अस्तित्व कायम रहता है। हालांकि राजनीतिक दलों के विचार भले ही टिकाऊ हों मगर कई राजनेता इसे लेकर अस्थिर ही रहते हैं क्योंकि राजनेता कपड़े की तरह विचार भी रातों-रात बदल लेते हैं जिसे आम तौर पर दल-बदल कहते हैं। भारतीय राजनीति में वैचारिक संक्रमण भी खूब आते रहे। वैसे इन दिनों पूर्वोत्तर के असम और दक्षिण के तमिलनाडु, पुदुचेरी और केरल के साथ पष्चिम बंगाल में भी चुनावी जंग जारी है। देखा जाय तो भारत में चुनावी मौसम अक्सर रहते हैं बस क्षेत्र और स्थान में बदलाव रहता है और हर चुनाव में सुषासन स्थापित करने के कसीदे गढ़े जाते हैं। इसके पीछे मात्र एक वजह जनमत का मुंह अपनी ओर मोड़ना रहा है। बाद में सुषासन कितना मिला, मिला या नहीं मिला यह सिर्फ चर्चे में रह जाता है। इन दिनों बंगाल चुनावी तपिष में कुछ ज्यादा ही गरम हो रहा है। भाजपा सत्ता हथियाने के लिए पूरी ताकत झोंके हुए है और सत्तासीन तृणमूल कांग्रेस भी कुर्सी बचाने की होड़ में लगी हुई है। मगर जिस तरह सियासी पैंतरे के बीच नेता कूद-फांद कर रहे हैं उससे हवा का रूख नया रास्ता अख्तियार कर सकती है। हालांकि चुनाव परिणाम आने पर कुछ भी कहना कठिन है पर यह कहना सहज है कि बंगाल में वादों और इरादों की झड़ी लगी हुई है और सुषासन देने की होड़ भी।
प्रधानमंत्री मोदी की कोलकाता रैली जो 7 मार्च को आयोजित हुई में यह हुंकार देखी गयी कि जल्द आ जायेगा बंगाल में सुषासन। भाजपा का षीर्शस्थ नेतृत्व बंगाल के लोगों को सुषासन देने के लिए मानो प्रतिबद्ध है। इसके पहले दल के अध्यक्ष नड्डा भी कह चुके हैं कि ममता ने तानाषाही से केवल तुश्टिकरण किया है हम बंगाल में सुषासन लायेंगे। गौरतलब सुषासन एक लोक प्रवर्धित अवधारणा है जो जन सषक्तिकरण के लिए जाना जाता है। सरकारें आती हैं और जाती हैं जबकि जनता विकास की बाट जोहती रहती है। ऐसा नहीं है कि सुषासन देने का राजनीतिक दलों का यह पहला प्रकरण है। चुनाव दर चुनाव फिजा में यह षब्द गूंजता रहा है पर हकीकत यह है कि देष में हर चैथा व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे और इतने ही अषिक्षित हैं। बेरोज़गारी सारे रिकाॅर्ड चकनाचूर कर चुकी है और पढ़ा-लिखा वर्ग ठगा महसूस कर रहा है। नौकरी देने के वायदे भी बंगाल की फिजा में गूंज रहे हैं पर सत्ता प्राप्ति के बाद सुर ऐसे बदल जाते हैं मानो यह बात उन्होंने कही ही न हो। जिस सुषासन के दम पर राजनीतिक दल सत्ता हथियाने की फिराक में है उसके लिए क्या होना चाहिए यह भी समझना सही रहेगा। गौरतलब है कि देष में सुषासन सूचकांक जारी होते हैं जिसमें षासन के विभिन्न मापदण्डों के आधार पर कई सेक्टर कसौटी पर होते हैं। कृशि और सम्बद्ध क्षेत्र, खाद्यान्न उत्पादन की वृद्धि दर, बागवानी उपज, दूध उत्पादन व मांस उत्पादन समेत फसल बीमा आदि की स्थिति का आंकलन षामिल है। बेहतर षासन व्यवस्था के मामले में दिसम्बर, 2019 में जारी सुषासन की यह सूची से यह पता चलता है कि तमिलनाडु देष का अव्वल राज्य है जबकि महाराश्ट्र और कर्नाटक दूसरे और तीसरे पर है। चैथे स्थान पर छत्तीसगढ़ आता है। पष्चिम बंगाल यहां दसवें स्थान पर है जिसकी स्थिति भाजपा षासित बिहार, उत्तर प्रदेष, गोवा आदि से कहीं बेहतर है। स्पश्ट है कि गुड गवर्नेंस इंडेक्स पष्चिम बंगाल को इतना खराब नहीं दिखा रहा है जितना कि विरोधी वहां बखेड़ा खड़ा किये हुए हैं। यहां सुषासन अव्वल नहीं है मगर कमजोर भी नहीं है। कहा जाये तो ममता सरकार को निर्ममता नहीं करार दी जा सकती।
पष्चिम बंगाल से वामपंथ को राजनीतिक क्षितिज से ओझल हुए एक दषक हो गया तब से ममता बनर्जी की सरकार है। यहां वर्गों में बंटी राजनीति भी खूब विस्तार लिए हुए है। भाजपा किस आधार पर बंगाल की सत्ता पर काबिज होना चाहती है इस गुणा-भाग को भी समझना ठीक रहेगा। दरअसल भारतीय जनता पार्टी 2016 के विधानसभा चुनाव में कुल 294 सीटों के मुकाबले मात्र 3 पर सिमट गयी थी मगर 2019 के लोकसभा चुनाव में वह 18 सीटें जीती थी जबकि ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल 22 पर थी। यहां भाजपा की बड़ी जीत मानी गयी। इसी को देखते हुए भाजपा को यह विष्वास है कि बंगाल के मतदाता उसे निराष नहीं करेंगे और यही कारण है कि बंगाल को अपने पक्ष में करने के लिए पार्टी ने पूरी ताकत झोंक दी है। तुणमूल कांग्रेस के कई जिताऊ और मजबूत चेहरे अब भाजपा के तारणहार बन गये हैं जिसमें अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती भी षामिल हैं। ममता बनर्जी पहले जैसी मजबूत नहीं है पर टक्कर में कोई कमी नहीं है। फिलहाल बंगाल के विधानसभा चुनाव में सीधी लड़ाई भाजपा और तृणमूल कांग्रेस की ही दिखती है मगर ओवैसी फैक्टर ममता बनर्जी का खेल बिगाड़ सकता है। पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव में भी ओवैसी फैक्टर प्रभावी रहा और राजद बड़ी जीत के बावजूद सत्ता हासिल नहीं कर पायी। हालांकि सियासत में अंदाजा पूरी तरह सच हो नहीं पाता और अन्तिम समय तक रूख में उतार-चढ़ाव बना रहता है।
गौरतलब है कि पष्चिम बंगाल में मुस्लिम वोट सियासी हथियार के तौर पर देखे जाते हैं साल 2006 तक राज्य के मुस्लिम वोट बैंक पर वाममोर्चा का कब्जा था उसके बाद ये वोटर धीरे-धीरे ममता की तृणमूल कांग्रेस की ओर आकर्शित हुए और 2011 तथा 2016 के विधानसभा चुनाव में इसी वोट बैंक की बदोलत ममता सत्ता में आई भी और पुनः काबिज हुई। ममता बनर्जी पर मुस्लिम तुश्टीकरण का आरोप भी लगता रहा। दरअसल पहली बार सत्ता में आने के साल भर बाद भी ममला सरकार ने इमामों को ढ़ाई हजार रूपए मासिक भत्ता देने का एलान किया था जिसकी जमकर आलोचना हुई और कलकत्ता हाईकोर्ट की आलोचना के बाद इस भत्ते को अब वक्फ बोर्ड के जरिये दिया जाता है। चुनाव में स्थानीय और बाहरी का भी नारा गूंज रहा है। बीजेपी हिन्दू वोटरों को अपनी ओर आकशित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही और यह संकल्प कई बार दोहरा चुकी है कि प्रदेष को अमार सोनार बांग्ला का खिताब पुनः वापस करायेगी। चुनाव के विगुल के साथ फिलहाल ताकत झोंकी जा रही है। हालांकि बाकी चुनावी राज्यों में भाजपा ऐसी ही ताकत लगा रही है। यह तो मतदाताओं को तय करना है कि वे किसे सत्तासीन करेंगे। दो टूक यह भी है कि सियासती लोग अपने भाशण से जनता को मंत्रमुग्ध करके वोटो पर कब्जा तो कर लेते हैं मगर वास्तव में उतना नहीं करते जितना बोलते हैं। इसकी भी मापतौल जनता को करनी चाहिए। वैसे सरकारें खरी तब उतरती हैं जब जनता चैकन्नी होती है। सुषासन प्रत्येक नागरिक का अधिकार और इसे पूरा करना सरकार का दायित्व मगर चुनावी फिजा में जो फलक पर गूंजता है वह जमीन पर कितना उतरता है यह अक्सर पड़ताल में निराष ही करता रहा है।

डाॅ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक
प्रयास आईएएस स्टडी सर्किल
लेन नं.12, इन्द्रप्रस्थ एन्क्लेव, अपर नत्थनपुर
देहरादून-248005 (उत्तराखण्ड)
मो0: 9456120502
ई-मेल: sushilksingh589@gmail.com

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