भारत और अंतरराष्ट्रीय सम्बंध : एक समसामयिक विवेचन

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भारत और अंतरराष्ट्रीय सम्बंध : एक समसामयिक विवेचन

भारत और अंतरराष्ट्रीय सम्बंध : एक समसामयिक विवेचन

पुस्तक परिचय द्वारा सुशील सर
वर्तमान युग सूचना का है और इन्हीं सूचनाओं का संकलन तत्पष्चात् उसकी प्रस्तुति आज की दुनिया में बौद्धिकता का प्रमाण है। अध्ययन और अध्यापन से जुड़े वे तमाम वर्ग जो षब्द और वाक्यों में एक नई दक्षता तथा स्वयं के ज्ञान पुंज को बड़ा करने की फिराक में है उनके लिए मेरे द्वारा लिखित व संकलित यह पुस्तक एक बेहतरीन खोज सिद्ध होगी। जीवन के पड़ाव में ऐसा भी समय आता है जब विचार पाण्डुलिपि बनने लगते हैं और प्रकाषक के माध्यम से एक पुस्तकीय संरचना में जब यही पाठकों के हाथ में, विद्यार्थियों की मेज पर और विष्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के पुस्तकालय में होती है तो लेखक स्वयं को सबल समझने की भूल करता अवष्य है और इस प्रकार के अवसर लोगों के जीवन में पहले भी आये हैं और आगे भी आते रहेंगे। विचार भले ही किसी भी प्रारूप और प्रभाव से जकड़े हों मगर जानकारी की दृश्टि से महत्ता और प्रासंगिकता से परे नहीं होते। मैंने अपने दो दषक के लेखन काल में यह एहसास किया है कि षब्दों को बुनना किसी गाढ़ी कमाई से कम नहीं होता। पुस्तक में संकलित लेख ऐसी थाती हैं जो भारत और अन्तर्राश्ट्रीय सम्बंध के ताने-बाने को समझने का अवसर देता है। यह 110 लेखों का संकलन है जो वर्श 2014 से 2020 के बीच की रचना अवष्य है मगर इसके भीतर दषकों का भी प्रमाण उवलब्ध है।
पुस्तक की वास्तविक परिभाशा क्या है यह पाठकों को तभी पता चल पायेगा जब इसके भीतर निहित पक्षों को उकेरने का प्रयास करेंगे। विदित है कि समय और विमर्ष का गहरा सम्बंध रहा है। पुस्तक में संकलित लेख पुंज दषकों पुराने नहीं है मगर आभास सदियों का करा सकते हैं। जाहिर है संकलित लेख को लेकर समय बहुत तो नहीं बीता है मगर बरसों पुराने अवतरण को जब भी पढ़ने का मौका मिलता है यकीन मानिए उसके प्रति आकर्शण और चेश्टा का भाव हमेषा बड़ा ही रहता है। मैं सोचता हूं कि यह पुस्तक इस मनोबल से भी आपको युक्त करने में कामयाब होगी कि इसमें निहित परिप्रेक्ष्य आपके ज्ञान कौषल को और सघन बनायेगा। लेखक जो सोचता है, वही विचार षब्द और वाक्य का रूप लेते हैं मगर यहां बात इतनी ही नहीं है यहां तथ्यों को जुटाना और एक सम्बोधन में परिश्कृत करना, यह जताता है कि इसके प्रति घोर आस्था भी रही है।
पुस्तक के भीतर ऐसा क्या समाविश्ट है जिसे बताने में मुझे अपार हर्श होगा और आपको जानने में खुषी। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि यदि मुझसे कोई यह प्रष्न करे कि पुस्तक में सबसे अच्छी बात क्या है तो मैं यहां क्षमा प्रार्थी रहूंगा क्योंकि एक लेखक के रूप में मुझे हमेषा यह मुष्किल रही है कि किसे अच्छा कहूं, किसे कम अच्छा कहूं या किसे खराब करार दे दूं। विचार एक प्रकाष पुंज है जिसमें रोषनी भरी है मगर यह तय करना है कि उस रोषनी की खोज किसे है, किसे नहीं। जो आज काम नहीं आती या समझ नहीं आती मैं समझता हूं कि वह भविश्य या कल के लिए है। एक प्राध्यापक होने के नाते मैं विद्यार्थियों और प्रतियोगियों के बीच दो दषक से समय बिता रहा हूं और यह आज भी अनवरत है। कक्षा में मैं हमेषा इस बात को उद्घाटित करता रहा हूं कि आवष्यक नहीं है कि जो आज समझ में न आये वह कल भी समझ में नहीं आयेगा। इतना ही नहीं इसके साथ यह भी जोड़ना नहीं भूलता कि जो आज समझ में न आये समझो वो कल के लिए है। इस विन्यास के आधार पर मैं अपने उधेड़-बुन को कम कर लेता हूं और कहूं तो खत्म कर लेता हूं। इसी आधार पर इस पुस्तक को मैं एक बेहतरीन संकलन करार देता हूं, हो सकता है कि इसके अंदर निहित अध्याय या प्रसंग सभी एक जैसे रोचक न लगें मगर जो आज रोचक नहीं लग रहे हैं सम्भव है कि कल वही विमर्ष के केन्द्र में हों। बस उस समय का इंतजार करना होगा।
अब मैं आपको बिना देर किये पुस्तक में निहित कुछ बारीक बातों को आपके सम्मुख रखता हूं। पुस्तक का आंकलन और संकलन बहुत सरल और उदार है। यह पारदर्षी के साथ कुछ हद तक संवेदनषील भी है। भारत और अन्तर्राश्ट्रीय सम्बंध के सरोकार से गुथी और निर्मित इस पुस्तक के भाव को कुछ इस प्रकार संक्षिप्त में समझा जा सकता है। वर्श 2014 के नवम्बर माह में जी-20 की आॅस्ट्रेलिया के ब्रिस्बेन में हुआ सम्मेलन और वहां भारत की उपस्थिति और स्थिति का सजीव चित्रण उस काल की याद को अवष्य ताजा करेगी जबकि इसके पहले सितम्बर 2014 में तत्कालीन अमेरिकी राश्ट्रपति बराक ओबामा के न्योते पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति भारतीय मूल के अमेरिकियों के लिए कैसा कौतूहल था उसका विहंगम दृष्य भी इस पुस्तक में आपको दिखाई देगा। इतना ही नहीं प्रति वर्श की दर पर बदलते अन्तर्राश्ट्रीय सम्बंध और कूटनीतिक परिदृष्य को ध्यान में रखकर जो बातें दौर के अनुपात में कागज पर उतारी गयी हैं उसमें एक गजब का सम्मोहन निहित है। दक्षिण एषिया के देषों के साथ भारत का रिष्ता, आसियान तक पहुंचने का पूरा प्रयास, दक्षिण चीन सागर को लेकर भारत की नीति साथ ही हिन्द महासागर के मामले में चीन की बेचैनी और भारत का एक पारदर्षी रवैये को पुस्तकीय रूप में पढ़ना आपको रोचकता से भरने का काम करेगा। पड़ोसी प्रथम की नीति पर चलने वाला भारत, षान्ति और अहिंसा के मार्ग को सषक्त करने आतंक के विरूद्ध खड़े होने साथ ही पड़ोसियों के कुटिल चालों को मात देने का मजबूत इरादा भी यहां दर्षाया गया है। चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी को सम्बंधों के कई मोड़ में भारत से उलझते हुए देखा जा सकता है और इस गांठ को खोलने का काम भी समय-समय पर कैसे किया गया है इसका दिग्दर्षन भी इस पुस्तक के माध्यम से सम्भव है। पष्चिम के साथ पूरब को देखने की परम्परा का पूरा ध्यान कई लेखों के माध्यम से इस पुस्तक में पायेंगे। यूरोपीय देष से सम्बंध हों, आतंकवाद पर दुनिया को एकजुट करना हो, जलवायु परिवर्तन सम्मेलन व पृथ्वी बचाने आदि से सम्बंधित मुद्दे हों भारत की प्रचण्ड स्थिति का उल्लेख भी यहां मिलेगा। संयुक्त राश्ट्र संघ की चारदिवारी के भीतर भारत का कैसा कद है यह पुस्तक यह भी बताती है। अमेरिका, कनाडा, मैक्सिको, ब्राजील व दक्षिण अमेरिका के अन्य देषों समेत अफ्रीकी देषों तक भारत की अन्तर्राश्ट्रीय राजनीति और सम्बंध किस प्रारूप में आगे बढ़ी है उसका सजीव चित्रण का षब्द संकलन भी यह पुस्तक है। दुनिया में राश्ट्रीय हित सभी देषों की प्राथमिकता होती है भारत अपने राश्ट्रीय हितों को न केवल पहचानता है बल्कि उसे संजोये रखने की कूबत रखता है। यही कारण है कि भारत अपनी लकीर पर चलते हुए दुनिया में बेहतरीन पैठ बनायी है जिसकी चर्चा पुस्तक के कई हिस्सों में मिलेगी। इन सबके बावजूद कुछ घटनायें इस प्रकार की भी हैं जहां निराषा और वैष्विक अवसाद भी देखने को मिलता है। खाड़ी देषों में संघर्श, चीन और पाकिस्तान के साथ भारत की तमाम कोषिषों के बावजूद संघर्श का समाप्त न होना और वैष्विक आतंकवाद के साथ दक्षिण-एषियाई देषों का समूह सार्क की प्रासंगिकता को खतरा उत्पन्न होना।
पुस्तक में निहित भाव सपाट नहीं बल्कि स्नायु तंतुओं व भाव-भंगिमाओं को कुछ हद तक झकझोरने का भी काम करेंगे। इसमें लिखित सभी लेख अलग-अलग समय का नेतृत्व करते देखे जा सकते हैं जिसमें खूबसूरत निर्णय, संचार और अभिप्रेरणा के समावेष के साथ चुनौती भी निहित है। मैं समझता हूं कि भारत का दुनिया से सरोकार का पूरा परिदृष्य पुस्तक में न सही मगर दौर के अनुपात में इसमें बहुत कुछ अटा पड़ा है। अन्ततः आमुख के इस अन्तिम चरण में आपके सम्मुख पुस्तक में संकलित लेखों की सारगर्भिता, प्रासंगिकता और विमर्ष को महत्ता प्रदान करते हुए अपनी संवेदनषीलता और सहृदयता प्रकट करता हूं और आषा करता हूं कि षब्दों के इस भाव सागर में मैं जो कुछ भी ढूंढ पाया, जैसा भी बता पाया उसका बोध और विमर्ष आप तक पहुंचा अवष्य होगा।

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