विनिवेश और निजीकरण के आगे

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विनिवेश और निजीकरण के आगे

अर्थव्यवस्था उत्पादन, वितरण और खपत की एक सामाजिक व्यवस्था है जो किसी देष या क्षेत्र विषेश में अर्थषास्त्र का गतिषील आईना भी है। इस षब्द की सबसे प्राचीन कसौटी ईसा पूर्व कौटिल्य द्वारा लिखित ग्रन्थ अर्थषास्त्र में देख सकते हैं। इसी आर्थिक गतिषीलता को बनाये रखने के चलते सरकारें नये कदम भी उठाती हैं और नये आयामों की खोज में भी लगी रहती हैं। हालांकि विनिवेष और निजीकरण जैसे षब्द भारतीय षासन पद्धति में नये नहीं हैं पर इन्हें नूतन तरीके से प्रसार देने का प्रयास जारी है। अर्थव्यवस्था के समक्ष उत्पन्न चुनौतियों को देखते हुए सरकार द्वारा विनिवेष और निजीकरण को तेजी से आजमाया जा रहा है। जाहिर है इससे सरकार को अतिरिक्त राजस्व मिलेगा और षासन की दक्षता में वृद्धि होगी ताकि सुषासन का मार्ग भी चैड़ा हो सके। मगर इस हकीकत को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता कि एक सीमा के बाद इसके कई साइड इफेक्ट हो सकते हैं। देष लोकतंत्र और लोक कल्याण की परिपाटी से युक्त है यहां सरकार और जनता का सीधा संवाद है और लोक कल्याण से सरोकार है। यहां मुनाफे का नहीं बल्कि जनहित को हर सूरत पर सुनिष्चित करने की धारा का प्रस्फुटन होता है। ऐसे में इससे जुड़े कदम की जमीन दलदली नहीं होनी चाहिए। लोकनीति चाहे विनिवेष से जुड़ी हो या निजीकरण से सरकार कुछ करती है या कुछ नहीं करती है या जो भी करती है वही उसकी नीति होती है। बीते कुछ वर्शों से विनिवेष और निजीकरण को लेकर चर्चा फलक पर है और इसे एक नई ऊँचाई देने का प्रयास भी जारी है। स्वतंत्र भारत में सबसे बड़ा आर्थिक सुधार 24 जुलाई 1991 को आये उदारीकरण को माना जाता है। यहीं से विनिवेष के दौर की षुरूआत होती है। सरकारें बदलती रहीं मगर यह नीति निरंतरता लिए रही। मौजूदा सरकार का फोकस भी विनिवेष पर बाकायदा देखा जा सकता है। वित्त वर्श 2021-22 के लिए 1 फरवरी 2021 को पेष बजट में 1 लाख 75 हजार करोड़ की वसूली विनिवेष से ही तय की गयी है जबकि इसके ठीक एक साल पहले वित्त वर्श 2020-21 के लिए लक्ष्य 2 लाख 10 हजार करोड़ का था मगर कोविड-19 की महामारी के चलते सरकार इस मामले में मामूली ही धन जुटा पायी। इतना ही नहीं वर्श-दर-वर्श विनिवेष के लक्ष्य भी बड़े होते गये। वित्त वर्श 2014-15 में सरकार ने 58,425 करोड़ रूपए का विनिवेष लक्ष्य रखा था जबकि 26,068 करोड़ रूपए ही जुटा पायी थी। 2015-16 में यही लक्ष्य 69,500 करोड़ रूपए का था मगर महज 23,997 करोड़ से ही संतोश करना पड़ा। इसी तरह 2016-17 और 2017-18 में भी तय लक्ष्य से वसूली कम हुई लेकिन वित्त वर्श 2018-19 में 80,000 करोड़ रूपए का लक्ष्य और हासिल हुआ 85,000 करोड़। मौजूदा सरकार का यही एक वर्श तय लक्ष्य से अधिक है अन्यथा विनिवेष के मामले में लक्ष्य बड़े और ताकत अधिक झोके गये बावजूद इसके उगाही बौनी ही सिद्ध हुई।
उदारीकरण, निजीकरण तथा भूमण्डलीकरण आधुनिक युग की प्रमुख विषेशताएं हैं जबकि विनिवेष को आर्थिक सुगमता का एक बेहतर आर्थिक माॅडल के रूप में सरकारें देखती रही हैं जो तीन दषक पुराना है। 1991-92 में जब सरकारी सेक्टर की 31 कम्पनियों में विनिवेष किया गया और 3,038 करोड़ रूपए सरकारी खजाने में आये तो सरकार का सुखद महसूस करना लाज़मी था। दरअसल स्वतंत्रता के बाद पब्लिक सेक्टर पर तेजी से जोर दिया जाने लगा। पहले एड़ी-चोटी का जोर लगाकर तमाम क्षेत्रों में सरकारी कम्पनियों का विस्तार किया गया और 80 के दषक तक ऐसी कम्पनियों को ठीक से चलाना ही मुष्किल होने लगा। वैसे भी 1989 के विष्व बैंक की इस रिपोर्ट ‘स्टेट टू मार्केट’ में देखें तो यह स्पश्ट था कि राज्य से बाजार की ओर चलने का बिगुल बज चुका था। यह वही दौर था जब दुनिया सुषासन की राह ले रही थी और अर्थव्यवस्था खुलेपन की ओर जा रही थी और भारत भी आर्थिक उदारीकरण की ओर बढ़ चला था। इंग्लैण्ड पहला देष है जिसने विष्व बैंक द्वारा गढ़ी सुषासन की नई परिभाशा के साथ स्वयं को सुसज्जित किया जबकि 1992 में इसी सुषासन से भारत भी ओत-प्रोत होने की ओर था। उदारीकरण के चलते आर्थिक उठान धीरे-धीरे दिखने लगा। अगस्त 1996 में एक विनिवेष आयोग का गठन किया गया जिसके मुखिया जीवी रामकृश्णा थे। आयोग का काम सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में चरणबद्ध तरीके से हिस्सेदारी बेचने को लेकर सलाह देना साथ ही इस प्रक्रिया पर निगरानी रखना। इस आयोग द्वारा 57 सरकारी कम्पनियों के निजीकरण की सिफारिष की गयी थी। वाजपेयी षासनकाल में बाकायदा विनिवेष मंत्रालय भी बनाया गया था जिसके मंत्री अरूण षौरी थे। हालांकि मई 2004 में आयोग समाप्त कर दिया गया और मंत्रालय का भी इतिश्री हो गया था। गौरतलब है कि 1991-92 से लेकर 2000-01 के बीच अर्थात् एक दषक में विनिवेष से धन जुटाने का जो लक्ष्य रखा गया था उसके आधे से कम की वसूली हो पायी थी। इससे स्पश्ट है कि विनिवेष जितना सुगम आर्थिक माॅडल दिखता है धरातल पर उस ढंग से उतरता नहीं है जबकि इसके अनुमान के आधार पर सरकारें नियोजन को पटरी पर लाने का मनसूबा पाल लेती हैं। ऐसे में इसके बूते किये जाने वाले कई लोकहित के कार्य भी प्रभावित होते हैं।
सरकार कम्पनियां चलाये और मुनाफे का कारोबार करे इसकी सम्भावना कम ही है। हालांकि कई नवरत्न और मिनीरत्न कम्पनियां इस मामले में सफल हैं लेकिन महात्वाकांक्षा को पूरा आसमान दे सके इसकी सम्भावना पूरी तरह नहीं कही जा सकती। निजी क्षेत्र वाले तो यह नहीं चाहेंगे कि सरकारी कम्पनियों का कारोबार अच्छा हो। जिन अर्थव्यवस्थाओं में जीडीपी में कमी, प्रति व्यक्ति आय में गिरावट और जनसंख्या अधिक के साथ गरीबी और बेरोज़गारी उठान लिए हो, सामान्यतया उसे विकासषील अर्थव्यवस्था का दर्जा दिया गया। भारत इसी श्रेणी में आता है और लगभग 3 ट्रिलियन डाॅलर की अर्थव्यवस्था रखता है साथ ही 2024 तक इसे 5 ट्रिलियन डाॅलर का लक्ष्य रखा है। मगर इसके लिए जीडीपी दहाई में होनी चाहिए। काविड-19 की मार में जीडीपी को भी जमींदोज कर दिया है। ऐसे में 2024 में आर्थिक लक्ष्य मिलेगा या नहीं अभी कहना जल्दबाजी होगा। फिलहाल विनिवेष और निजीकरण के फर्क को भी समझना सही रहेगा। विनिवेष में पब्लिक सेक्टर की कम्पनी में सरकार कुछ हिस्सा बेचती है लेकिन कम्पनी पर सरकार का ही नियंत्रण रहता है जबकि निजीकरण में बहुमत हिस्सेदारी प्राइवेट कम्पनियों को दे दिया जाता है और इस तरह से प्रबंधन निजी कम्पनी के हाथों में चला जाता है। दो टूक यह भी है कि विनिवेष के संदर्भ में सरकार नियंत्रण निजी कम्पनी को दे या न दें यह उस पर निर्भर है लेकिन निजीकरण में ऐसा नहीं है। सवाल यह है कि विनिवेष की आखिरकार आवष्यकता क्यों पड़ती है। इसके पीछे बड़ा कारण कम्पनी का अच्छा प्रदर्षन न करना है। कम्पनी चलाने के लिए संचित निधि पर भार बने रहने से वित्तीय बोझ लगातार बना रहता है ऐसे में सरकार इससे पीछा छुड़ाना चाहती है। इससे न केवल सरकारी खजाने से पैसा निकलना बंद होता है बल्कि उल्टे खजाना भरने का अवसर मिलता है लेकिन 3 दषक की पड़ताल यह बताती है कि विनिवेष से उगाही के लक्ष्य कुछ वित्त वर्श को अपवादस्वरूप छोड़ दें तो मिला नहीं है। हालांकि विनिवेष की प्रक्रिया इतनी सरल भी नहीं है इसके लिए बाकायदा खरीददार ढ़ूंढ़ने पड़ते हैं। गौरतलब है जनवरी 2020 में सरकार ने घोशणा कर दी थी कि वह कर्ज के बोझ में दबी भारतीय विमानन कम्पनी एयर इण्डिया की पूरी हिस्सेदारी बेचने के लिए तैयार है मगर इसमें कठिनाई बनी हुई है। यहां बता दें कि साल 2018-19 में एयर इण्डिया की सभी देनदारी 70,686 करोड़ रूपए से अधिक थी। सरकार का इरादा आईडीबीआई बैंक, बीपीसीएल, षिपिंग काॅरपोरेषन आॅफ इण्डिया, कंटेनर काॅरपोरेषन के अलावा पेट्रोलियम कम्पनियों आदि समेत कईयों की हिस्सेदारी बेच कर रकम जुटाने की है जो अलग-अलग कीमतों की है। 2021-22 में विनिवेष से सरकार तीन फीसद से कम राजस्व जुटा पायी है। यह इस बात को पुख्ता करता है कि हाथी के दांत दिखाने के कुछ और खाने के कुछ और हैं।
निजीकरण का बादल आर्थिक आसमान में देख सकते हैं गौरतलब है इसे भी राजस्व का एक बेहतर जरिया माना जाता है। मगर इसके बजाए यदि संरचनात्मक, प्रक्रियागत और व्यावहारिक सुधार पर बल दिया जाये तो नतीजे और बेहतर हो सकते हैं। वैसे कहा जा रहा है कि मौजूदा सरकार निजीकरण के लिए 18 सेक्टर को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना है जिसे तीन व्यापक खण्डों में विभाजित किया गया है खनन और पर्यवेक्षण, विनिर्माण, प्रसंस्करण एवं निर्माण और सेवा क्षेत्र। जाहिर है बैंकिंग, बीमा, इस्पात, उर्वरक, पेट्रोलियम आदि इसकी जद में रहेंगे। अब सवाल यह है कि क्या बेचना ही विकल्प रह गया है। गौरतलब है कि तीन दषक पहले जो कदम उदारीकरण के तहत उठे थे अब वो पूरा विस्तार ले चुका है। लोक सषक्तिकरण यदि सुषासन है तो निजी के हाथों में बढ़ती ताकतें क्या नागरिकों का षोशण नहीं होगा। राजकोशीय घाटे को कम करने के लिए भी सरकार विनिवेष की ओर कदम बढ़ाती है साथ ही इस पूंजी का इस्तेमाल कर्ज कम करने के लिए भी करती है। मगर लोक कल्याण इस प्रक्रिया से क्या प्रभावित होता है। जाहिर है निजी का तात्पर्य लाभकारी होना और सरकारी का मतलब कल्याणकारी। साफ है जितना अधिक निजी का दखल बढ़ेगा लोक कल्याण उतना प्रभावित होगा। मुनाफे के बगैर निजी सेक्टर काम नहीं कर सकते और घाटे में रहकर भी जनता के हित सुनिष्चित करना सरकार अपना धर्म समझती है। बैंकों का विलय हो या सरकारी कम्पनियों का विनिवेष या फिर निजी के हाथ में कुछ का नियंत्रण देने जैसी बात हो इनके कुछ फायदे तो कुछ नुकसान भी हैं। मई 2020 में आत्मनिर्भर भारत की जो धारणा प्रकट हुई उसका प्रभाव भी उपरोक्त बिन्दुओं में देख सकते हैं। 2021-22 के बजट में आत्मनिर्भर भारत के लिए सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम नीति की घोशणा की गयी थी इसके तहत रणनीतिक क्षेत्र में पीएसयू के जरिये सरकार की मौजूदगी बहुत कम हो जायेगी और गैर रणनीतिक क्षेत्रों में पीएसयू का निजीकरण होगा या उन्हें बंद कर दिया जायेगा। संकेत साफ है सब कुछ पैसे के लिए हो रहा है। जाहिर है पैसे से विकास होगा लेकिन क्या विनिवेष और निजीकरण व्यापक रूप से लाकर कोई चुनौती तो नहीं खड़े कर रहे हैं जिसका असर आने वाले दिनों पर पड़े। वैसे भी देष का नागरिक इस भौतिकवाद में कहीं अधिक बड़ा उपभोक्ता बन गया है मगर वह पहले देष का नागरिक है। ऐसे में यदि नियंत्रण निजी के हाथों में होता भी है तो भी अपने नागरिकों के लोक कल्याण से सरकार मुंह नहीं मोड़ सकती।

डाॅ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेषन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेषन
लेन नं.12, इन्द्रप्रस्थ एन्क्लेव, अपर नत्थनपुर
देहरादून-248005 (उत्तराखण्ड)
मो0: 9456120502
ई-मेल: ेनेीपसोपदही589/हउंपसण्बवउ

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