म्यांमार में एक आदत लोकतंत्र की तलाश

image_1200x675_6062acd024058

म्यांमार में एक आदत लोकतंत्र की तलाश

म्यांमार में लोकतंत्र की सबसे बड़ी उम्मीद आंग सान सू की से कहां चूक हो गयी कि सत्ता पर एक बार फिर सेना का कब्जा हो गया। दषकों के संघर्श के बाद उन्हें देष की कमान मिली मगर लगता है कि 30 साल पहले षुरू हुई क्रान्ति वे स्वयं भूल गयी। 2015 के चुनाव में जब सू की को जबरदस्त जीत मिली तब लगा था कि देष के हालात सुधर जायेंगे लेकिन आधे कार्यकाल के बाद ही म्यांमार की जनता निराष होने लगी थी। देष का आर्थिक विकास भी धीमा था, लोगों के पास नौकरियों का आभाव और गृह युद्ध ने तो एक बार फिर लोकतंत्र को खतरे में ही डाल दिया नतीजन एक बार फिर म्यांमार सैन्य षासन के हाथों में है और वहां एक अदत लोकतंत्र की तलाष जारी है। हालांकि इस बार सेना ने मानो कोई खुन्नस निकाली हो। गौरतलब है सैन्य षासन के पांच दषक के बाद जब मार्च 2016 में म्यांमार इतिहास के उस मोड़ पर आ खड़ा हुआ जहां से न केवल लोकतंत्र बहाल होता है बल्कि दषकों की लोकतांत्रिक लड़ाई को भी लक्ष्य मिलता है। जाहिर है तब भारत के पड़ोसी म्यांमार में लोकतंत्र की एक गूंज उठी थी। म्यांमार के सांसदों ने नोबल पुरस्कार विजेता आंग सान सू की के करीबी और विष्वस्त तिन क्याॅ को देष का पहला असैन्य राश्ट्रपति चुना। इसी के साथ नवम्बर 2015 से जारी गतिरोध भी समाप्त हो गया था। तिन क्याॅ आंग सान सू की के करीबी में से थे। वैसे तो सू की पार्टी नेषनल लीग फाॅर डेमोक्रेसी ने चुनाव में भारी जीत हासिल की थी और दोनों सदनों में बड़े पैमाने पर बहुमत भी मिला था। बावजूद इसके म्यांमार में सेना ने मजबूत पकड़ बनाये रखी। गौरतलब है कि 1962 में देष की सत्ता को अपने हाथ लेने वाली इसी सेना ने म्यांमार के संविधान में एक ऐसा प्रावधान कर दिया था कि आंग सान सू की बड़ी जीत हासिल करने के बावजूद राश्ट्रपति बनने से वंचित हो गयी। प्रावधान के अनुसार जिनके करीबी परिजन विदेषी नागरिक हों वे राश्ट्रपति नहीं बन सकते। ध्यानतव्य हो कि आंग सान सू की के बेटों के पास विदेषी नागरिकता थी यही राश्ट्रपति बनने की राह में रोड़ा था। हालांकि तिन क्याॅ की जगह 2018 में विन म्यिंट को कमान दी गयी। म्यांमार लोकतांत्रिक तरीके से आगे बढ़ चला मगर क्या पता कि कोरोना के बीच लोकतंत्र को तानाषाही वायरस जकड़ लेगा और एक बार फिर म्यांमार की जमीन पर लोकतंत्र बंधक हो जायेगा।
म्यांमार में सैन्य तख्तापलट और आंग सान सू की समेत कई षीर्श नेताओं की गिरफ्तारी पर अमेरिका, इंग्लैण्ड समेत दुनिया के तमाम छोटे-बड़े देष न केवल चिंता जता रहे हैं बल्कि अमेरिका ने स्पश्ट किया है कि कि लोकतंत्र को बहाल करने के लिए सही कदम न उठाने पर कार्यवाही करेंगे। संयुक्त राश्ट्र ने भी इस पर चिंता जताई है। सवाल है कि म्यांमार में राजनीतिक संकट क्यों उत्पन्न हुआ। असल में सेना का यह आरोप कि चुनाव परिणामों में धांधली हुई है। नवम्बर 2020 के चुनाव में संसद के संयुक्त निचले और उपरी सदनों में सू की की पार्टी ने 476 सीटों में 396 सीटों पर जीत तो हासिल कर ली मगर सेना ने धांधली का आरोप लगाते हुए लोकतंत्र को बंधक बना लिया। गौरतलब है कि सेना के पास साल 2008 के सैन्य मसौदा संविधान के अंतर्गत कुल सीटों में से 25 फीसद आरक्षित हैं। इतना ही नहीं कई प्रमुख मंत्री पद भी सेना के लिए आरक्षित हैं। सेना का आरोप बड़े पैमाने पर धांधली का तो है पर सबूत देने में वे असफल है। ऐसे में यह साफ प्रतीत होता है कि लोकतांत्रिक सत्ता को हड़पने का उसका इरादा था। तानाषाही का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पहले लोकतंत्र पर कब्जा किया फिर सेना के खिलाफ प्रदर्षन कर रहे लोगों को मौत के घाट उतारा जा रहा है। सैकड़ों प्रदर्षनकारी मारे जा चुके हैं। यंगून, माण्डले समेत करीब दो दर्जन षहरों और कस्बों में रैलियां निकाली गयी। देखा जाये तो पुलिस और सैनिक आक्रामक रवैया अपनाये हुए है। इन सबकके बीच लोकतंत्र की रक्षा और बहाली को लेकर भी बातें सामने आयी हैं। सैन्य षासन जुंटा के प्रमुख ने कहा कि हम हर कीमत पर जनता की रक्षा करेंगे और जल्द ही चुनाव करायेंगे लेकिन इसका समय नहीं बताया।
सैन्य शासन का लम्बा इतिहास
पड़ताल बताती है कि म्यांमार में कभी अंग्रेजों का राज था। साल 1937 से पहले औपनिवेषिक सत्ता ने इसे भारत का ही एक राज्य घोशित किया था। बाद में इसे भारत से अलग कर अपना एक उपनिवेष बना लिया। गौरतलब है कि 80 के दषक के पहले इसका नाम बर्मा था। 4 जनवरी 1948 को बर्मा ब्रिटिष षासन से मुक्त हुआ और 1962 तक यहां पर लोकतंत्र के तहत सरकारें चुनी जाती थी। मगर 2 मार्च 1962 सेना के जनरल ने ने विन सरकार का तख्तापलट करते हुए सैन्य षासन की स्थापना कर दी। यहां के संविधान को निलम्बित कर दिया गया और बर्मा सैन्य षासन का लम्बा इतिहास के लिए जाना गया। सैन्य षासन के इस दौर में मानवाधिकार के उल्लंघन के भी आरोप यहां लगते रहे। सैन्य सरकार को बर्मा में मिलट्री जुंटा कहा जाता था। बर्मा में 5 दषक तक सैन्य षासन देखा जा सकता है। फिलहाल लम्बे संघर्श और कई उतार-चढ़ाव के बाद आखिरकार यहां पर लोकतंत्र बहाल हुआ जिसका श्रेय तीन दषक से इसके लिए प्रयासरत् आंग सान सू की को जाता है। मगर एक हकीकत यह भी है कि जहां लोकतंत्र को हड़पने की स्थिति बनती हो वहां ऐसा बार-बार बनने की सम्भावना रहती है। पाकिस्तान भी इसका बड़ा उदाहरण है।
भारत की चिंता
भारत को म्यांमार में सैन्य तख्तापलट और षीर्श नेताओं को हिरासत में लेने के चलते गहरी चिंता होना लाज़मी है। पड़ोसी देष में सत्ता के लोकतांत्रिक ढंग से हस्तांतरण का भारत हमेषा समर्थन करता रहा है। जाहिर है कानून के षासन और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विरूद्ध तानाषाही का म्यांमार में होना भारत के लिए चिंता का विशय है। भारत की लगभग 1600 किमी लम्बी सीमा म्यांमार से लगती है। भारत को इस सीमा पर अलगाववादियों के हिंसक गतिविधियों का भी सामना करना पड़ता रहा है। गैर कानूनी नषीले पदार्थों का अफगानिस्तान के बाद म्यांमार दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। पूर्वोत्तर भारत में म्यांमार से नषीले पदार्थों की खेप की सम्भावना भी यहां व्याप्त रही है। नषीले पदार्थों का अवैध व्यापार, विद्रोही गतिविधियों एवं तस्करी की बुराई से निपटने के लिए दोनों देषों के 1993 में एक संधि भी हुई थी। लोकतंत्र की बहाली के लिए जारी आंदोलन के दौर में भारत काफी हद तक तटस्थ की भूमिका में रहा है और उसका मानना था कि लोकतंत्र समर्थक षक्तियों को अलोकतांत्रिक ढंग से नहीं कुचला जाना चाहिए। देखा जाये तो भारत-म्यांमार व्यापार सम्बंध 1970 में व्यापार समझौते के बाद प्रगाढ़ होते गये और भारत-म्यांमार के लिए बड़ा निर्यातक बाजार है परन्तु चीन से चुनौती मिलती रही है। नवंबर 2015 के म्यांमार के चुनाव से ही यह सूरत दिखने लगी थी कि यहां लोकतंत्र बहाल होने से भारत को एक सधे हुए लोकतांत्रिक पड़ोसी का मिलना भी तय हो गया। प्रधानमंत्री मोदी तब वैष्विक फलक पर दिखने लगे थे और देखते-देखते म्यांमार के साथ गुणात्मक सम्बंध की सम्भावना तुलनात्मक बढ़ गयी। नवम्बर 2014 में मोदी ने म्यांमार, आॅस्ट्रेलिया समेत फिजी के दस दिवसीय दौरों के दिन 3 दिन म्यांमार में बिताये थे। यह दौरा आसियान और ईस्ट-एषिया समिट में भाग लेने से सम्बंधित था इसी दौरान सू की से उनकी मुलाकात हुई थी। तब से लेकर अब तक म्यांमार के साथ भारत का सम्बंध समतल बनाने का प्रयास किया गया है। हालांकि 2017 में म्यांमार के रखायन प्रान्त में रोहिंग्या मुसलमानों के साथ जातीय हिंसा में एक बार फिर तेजी आयी और इसी दौरान प्रधानमंत्री मोदी की म्यांमार यात्रा भी हुई। माना जा रहा है कि हजारों की तादाद में रोहिंग्या मुसलमान अवैध रूप से भारत में रह रहे हैं। महत्वपूर्ण यह भी है कि लोकतांत्रिक सरकार के समय में रोहिंग्या से जुड़ी घटना का होना लोकतंत्र की कमजोरी को दर्षाता है। आंग सान सू की रोहिंग्या मामले में देखें तो उनकी सरकार को सकारात्मक करार नहीं दिया जा सकता। गौरतलब है कि साल 2012 में रखायन प्रान्त में हिंसा हुई और यह मध्य म्यांमार और माण्डले तक फैल गया। बौद्ध और मुसलमानों के बीच हुई हिंसा में तब सैकड़ों मुसलमानों की मौत हुई थी। 2013 और 2014 में भी ऐसे ही साम्प्रदायिक हिंसा की तादाद बढ़ी थी। म्यांमार के वास्तविक नेता और लोकतंत्र के प्रणेता आंग सान सू की से रोहिंग्या समेत कई मसलों पर जमीनी हल भी निकालना था। भारत सरकार के लिए अवैध रोहिंग्या मुसलमान चिंता का कारण है पर समाधान अभी खटाई में है।
चीन का असमंजस
गौरतलब है कि म्यांमार आसियान के 10 देषों में से एक है और यहां के बाजार पर चीन का बाकायदा कब्जा है। यूरोपियन फाउंडेषन आॅफ साउथ एषियन स्टडीज के अनुसार म्यांमार के विद्रोहियों को चीन हथियार देकर भारत के खिलाफ उकसाता रहा है जबकि भारत लोकतंत्र का समर्थक रहा है। ऐसे में म्यांमार की सेना का चीन की तरफ झुकाव न हो ऐसा पूरी तरह खारिज करना सही नहीं है। चीन की अपनी बेबसी है जहां भारत को लोकतंत्र पसंद है वहीं उसे तानाषाह रवैया अच्छा लगता है। वह स्वयं दक्षिण चीन सागर में दादागिरी करता है और हिंद प्रषान्त क्षेत्र में विस्तारवादी नीति पर चलने का इरादा रखता है। कहा जाये तो हिन्द महासागर में वह अपनी पकड़ मजबूत करने की फिराक में न केवल रहता है बल्कि दक्षिण एषियाई देषों को कर्जा देकर उन्हें अपनी ओर मोड़ने और भारत को पीछे धकेलने का प्रयास भी करता रहा है। चीन के साथ म्यांमार के रिष्ते को लेकर आषंकायें चाहे जितनी हों मगर चीन म्यांमार में अस्थिरता नहीं चाहेगा साथ ही वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया को भी बढ़ावा नहीं देना चाहेगा। यदि वह ऐसा करता है तो हांग कांग में लोकतंत्र बहाली को लेकर बरसों से चल रहा आंदोलन को वह प्रेरणा दे सकता है। वैसे म्यांमार के प्रदर्षनकारी आर-पार की बात कर रहे हैं। उनका मानना है कि उनका भविश्य दांव पर लगा है और वे इस बार जीत हासिल कर पाये तो उनके बच्चे षान्ति से रह पायेंगे।
आंग सान सू की का दूसरा घर है भारत
5 साल की सत्ता में रहने वाली सू की की पार्टी और दोबारा बड़ी बहुमत हासिल करने के बावजूद कठिनाई में फंसा वहां का लोकतंत्र यह दर्षाता है कि इतिहास से बहुत सबक नहीं लिया गया है। बावजूद इसके पड़ोसी और भारतीय होने के नाते लोकतंत्र की अगुवाई करने वाली आंग सान सू की जितनी सराहना की जाए कम है। सू हमेषा भारत को अपना दूसरा घर कहती रही हैं। 5 दषकों से जो देष सैन्य षासन से उबरने की कोषिष में हो वहां पर लोकतांत्रिक हवाओं का क्या मतलब होता है यह म्यांमार से पूछा जाए तो इसका वाजिब उत्तर जरूर मिलेगा। जाहिर है लोकतंत्र की आष्यकता और अनिवार्यता से कौन परे रहना चाहता है पर इतने लम्बे संघर्श के बाद यदि यह उपहार मिले तो अनमोल ही कहा जायेगा। मगर इस पर एक बार फिर ग्रहण लगे तो माथे पर बल लाज़मी है। सू को भारत में कई साल तक रहने का अनुभव है। उनकी मां भारत में राजदूत रहीं हैं। दिल्ली के श्रीराम लेडी काॅलेज से पढ़ाई करने वाली आंग सान सू षिमला के इंस्टीट्यूट आॅफ एडवांस स्टडी में बाकायदा फेलो भी रही हैं। जाहिर है कि उनके अन्दर भारतीय संस्कृति और लोकतांत्रिक मूल्यों का वास है। ऐसे में म्यांमार को एक अच्छी दिषा देने की पूरी कूबत उनमें देखी जा सकती है। हालांकि राश्ट्रपति सू नहीं बल्कि उनके मित्र तिन क्याॅ रहे हैं पर लोकतांत्रिक मर्यादाओं के चलन के चलते म्यांमार में सू की तूती बोलती रही। पाकिस्तान और चीन के चलते भारत पड़ोस में कहीं अधिक संवेदनषील और चिंतित रहता है वहीं नेपाल, भूटान, म्यांमार समेत अन्यों के साथ भारत का अतिरिक्त प्रेम उसके आषावादी होने का ही प्रमाण है। अब तक म्यांमार लोकतंत्र के आभाव में उतना मजबूत नहीं था जितना कि इसकी बहाली के बाद देखा जा सकता है। फिलहाल म्यांमार के लिए साल 2021 एक बार फिर अमंगलकारी सिद्ध हुआ है और इसमें भी कोई दो राय नहीं कि इस लोकतंत्र की बहाली को लेकर दुनिया चिंतित है।

डाॅ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक

/ News paper articles

Share the Post

About the Author

Comments

No comment yet.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *