आंतरिक सुशासन हेतु चुनौती है नक्सलवाद

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आंतरिक सुशासन हेतु चुनौती है नक्सलवाद

भारत में आंतरिक सुरक्षा के प्रति गृह मंत्रालय की जवाबदेही है जबकि बाह्य सुरक्षा के लिए रक्षा मंत्रालय जिम्मेदार है। स्पश्ट है कि नक्सलवाद आंतरिक सुरक्षा पर चोट और गृह मंत्रालय के लिए बड़ी चुनौती रहा है। सामान्यतः यह बात आसानी से समझा जाता है कि नक्सल आंदोलन जन सामान्य का आंदोलन है और यह देष के अति पिछड़े इलाकों से सम्बंधित है। जहां आधारभूत संरचना की न केवल कमी है बल्कि संसाधनों का भी भरपूर आभाव है जबकि सच्चाई यह है कि नक्सलवाद प्रभावित तमाम इलाके खनिज संसाधनों के विपुल भण्डार से पटे हैं। विकास से अछूता यह क्षेत्र दषकों से न केवल नक्सलवाद की समस्या से जूझ रहा है बल्कि अब तो यह देष के एक-तिहाई जिले और आबादी तक विस्तार ले चुका है। नक्सलवाद को लेकर सरकार के दावों पर भी पहले भी सवाल उठते रहे हैं और हालिया घटना ने तो यह सवाल और गाढ़ा कर दिया है। सुरक्षा बलों के 22 जवान छत्तीसगढ़ के बीजापुर और सुकमा जिले की सीमा पर नक्सली हमले में षहीद हो गये जबकि 31 घायल बताये जो रहे हैं। एक कोबरा जवान लापता भी है और तलाषी अभियान जारी है। सीआरपीएफ के महानिदेषक की मानें तो आॅप्रेषन में किसी तरह की इंटेलिजेंस चूक नहीं हुई है। फिलहाल हमले की सूचना मिलते ही केन्द्र सरकार की त्वरित प्रतिक्रिया देखी जा सकती है। तीन राज्यों में मतदान पूरा होने के बाद नक्सलियों का गढ़ भेदने की सुगबुगाहट भी है। गृहमंत्री का कथन कि जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा और नक्सलियों को मुंह तोड़ जवाब दिया जायेगा। सवाल सरकार पर इसलिए है क्योंकि संदिग्ध माओवादियों से मुठभेड़ में मारे गये सुरक्षा बलों के जवानों से यह गलत साबित हुआ है कि पिछले 2 साल में माओवाद कमजोर हुआ है। असल में जब छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव 2018 में होने थे उस समय कांग्रेस पार्टी ने जन घोशणापत्र जारी किया था। उसे 2013 में झीरम घाटी में माओवादी हमले में मारे गये कांग्रेस नेताओं को समर्पित किया गया था। नक्सलवाद समस्या के समाधान के लिए नीति तैयार की जायेगा और वार्ता षुरू करने के गम्भीर प्रयास भी होंगे ऐसी बातें घोशणापत्र में थी। विकास के माध्यम से मुख्यधारा में नक्सलियों को जोड़ने की बात हर सरकार ने किया मगर यह सर्फ कागजों तक ही रह गया।
षान्ति स्थापित करने की बात करने वाली सरकारें नक्सलवाद को लेकर कोई समाधान की खास नीति नहीं बना पायी हैं जबकि इसे लेकर पहले भी व्यापक पैमाने पर चिंता की जाती रही है। गौरतलब है कि सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच बीते 4 दषकों में बस्तर के इलाके में संघर्श चल रहा है। साल 2000 में जब छत्तीसगढ़ बना तब भी यहां सिलसिला रूका नहीं। राज्य बनने से लेकर अब तक 32 सौ से अधिक मुठभेड़ की घटनायें हुई। गृह विभाग की रिपोर्ट यह बताती है कि जनवरी 2001 से मई 2019 तक माओवादी हिंसा में 1002 नक्सली मारे गये हैं तो 1234 सुरक्षा बलों के जवान षहीद हुए हैं। इतना ही नहीं 1782 आम नागरिकों की जान भी इसमें गयी है। हालांकि 3896 माओवादियों ने समर्पण भी किया है। चित्र यह बताता है कि नक्सलवाद और उसमें व्याप्त हिंसा जिस आकार और स्वरूप का है उसकी जड़े बहुत गहरी हो चली हैं। देष 75 साल की स्वतंत्रता के द्वार पर खड़ा है मगर मध्य भारत का छत्तीसगढ़, ओडिषा, झारखण्ड, आन्ध्र प्रदेष सहित कई राज्य और जिले नक्सलवाद की चपेट में है। स्पश्ट है कि षासन सारगर्भित नीतियां और अलग-थलग पड़े हिंसक क्रियाओं से लिप्त इन तत्वों को संभाल पाने में सफल नहीं रही है। आंतरिक सुरक्षा को खतरा बने माओवाद देष के लिए अब किसी बड़े तूफान से कम नहीं है। गृहमंत्री कह रहे हैं कि नक्सलियों ने अपनी मौजूदगी दिखाने के लिए हिंसा की है। यह बात सही है कि एक लम्बे अंतराल के बाद नक्सलवाद का यह हिंसक रूप देखने को मिला जिसमें 25 से 30 नक्सली भी मारे गये हैं। मगर देष में नक्सलवाद का किसी कोने में और किसी भी पैमाने पर उपलब्ध होना चैन से नहीं बैठने की नीति होनी चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं कि जनता को माओवादी विचारधारा से मोह भंग हो रहा है मगर माओवाद समाप्त नहीं हुआ है।
पड़ताल बताती है कि छत्तीसगढ़ नक्सलवाद से जिस पैमाने पर प्रभावित है वह कहीं अधिक चिंता वाला है। पिछले एक दषक में कई अलग-अलग घटनाओं में माओवादी खूनी अंजाम देते रहे हैं। मार्च 2007 में बीजापुर के पास रानीबोदली में आधी रात में जब माओवादियों ने पुलिस कैंप पर जब हमला किया तब पुलिस के 55 जवान मारे गये और इसी साल जुलाई में माओवादी हमले की चलते 23 पुलिसकर्मी षहीद हुए। 2009 जुलाई की घटना में भी 29 पुलिसकर्मी जबकि अप्रैल 2010 में बस्तर इलाके में बारूदी सुरंग के माध्यम से घटना को अंजाम देकर 76 जवानों को मार दिया गया। सिलसिलेवार तरीके से देखें तो साल 2010 के भीतर ही तीन माओवादी हमले हुए जिसमें दर्जनों सुरक्षा बल षहीद हुए। गौरतलब है कि बस्तर के दरमा घाटी में माओवादियों का हमला कांग्रेस पर बड़ी चोट वाला था। इसी में कांग्रेस पार्टी के प्रदेष अध्यक्ष समेत पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्या चरण षुक्ल समेत 30 लोग मारे गये। इसी को ध्यान में रखकर 2018 के छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में नक्सल समस्या के समाधान के लिए नीति और वार्ता षुरू करने के लिए गम्भीर प्रयास जैसे संदर्भ कांग्रेस ने अपने एजेण्डे में रखकर अपने नेताओं को समर्पित किया था। 2018 से छत्तीसगढ़ में भूपेष बघेल की सरकार है जो कांग्रेस से है। पड़ताल यह भी बताती है कि सुकमा में 24 अप्रैल 2017 को नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 25 जवान षहीद हुए थे और पिछले साल 21 मार्च को सुकमा में ही 17 सुरक्षाकर्मी षहीद हुए थे और अब एक बर फिर 22 जवान षहीद हुए जो पिछले 3-4 सालों में सबसे बड़ी घटना के रूप में देखी जा सकती है।
भारत में नक्सलवाद को खाद-पानी दषकों से मिलता रहा है और इसे फलने-फूलने में सामाजिक-आर्थिक समस्याओं ने कहीं अधिक काम किया। भूमि सीमा कानून का उल्लंघन, बेरोज़गारी, गरीबी, मूलभूत सुविधाओं का अभाव, षिक्षा व स्वास्थ समेत कई परिघटनाओं ने इसे पूरा अवसर दिया। अक्षम, अप्रषिक्षित व कमजोर मनोबल वाले सरकारी कर्मचारियों के साथ कमजोर राजनीतिक इच्छाषक्ति ने भी माओवाद व नक्सलवाद को वटवृक्ष बनने में कमोबेष मदद तो किया है। हर बार यह कहा जाता रहा है कि नक्सलवाद आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा है परन्तु इस खतरे को भांपने में कोई सरकार खरी नहीं उतरी। अब तो यह कई पीढ़ियों का जातीय दुष्मनी सा प्रतीत होता है। सरकारें आती और जाती रहीं जबकि नक्सलवाद वहीं ठहरा रहा और विषाल आकार लेता रहा। साल 2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री द्वारा नक्सली समस्या को भारतीय-आंतरिक सुरक्षा के सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में घोशणा के बाद कई कदम उठाये। गृह मंत्रालय के अंतर्गत एक अलग खण्ड नक्सल प्रबंधन अभियान को स्थापित किया गया। योजना आयोग द्वारा उन्हीं वर्शों में एक विषेशज्ञ समिति की स्थापना भी की गयी जिसमें बताया गया कि सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पक्षपात की समस्या के चलते यह असर हो रहा है। समिति ने यह भी बताया था कि स्थानीय समुदाय को सषक्त बनाने के प्रयास के अभाव के चलते नक्सलवाद का उद्भव है। सब कुछ साफ है पर निपटना आसान नहीं है। सुषासन का दावा करने वाली सरकारों के लिए नक्सलवाद आज भी टेढ़ी खीर बना हुआ है और आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती पर यह उम्मीद कर सकते हैं कि भविश्य में इससे निपटने के लिए कोई उपाय खोजा जायेगा।

डाॅ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक

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