पानी पर आत्म अनुशासन और सुशासन

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पानी पर आत्म अनुशासन और सुशासन

पानी क्या षिक्षा देती है और इस पर किया गया आत्म अनुषासन और सुषासन किस पैमाने पर हो षायद ही इससे कोई अनभिज्ञ हो बावजूद इसके पानी रोज़ बर्बाद हो रहा है। भारत में स्वतंत्रता से लेकर अब तक प्रति व्यक्ति पानी के मामले में तीन गुने से अधिक की घटोत्तरी देखी जा सकती है। रिपोर्ट भी यह कहती है कि साल 2025 तक भारत भी विष्व में जल संकट वाले देषों में से एक होगा। गौरतलब है कि देष के 40 फीसद से अधिक क्षेत्रों में सूखे का संकट है और 2030 तक बढ़ती आबादी के चलते देष में पानी की मांग और आपूर्ति में बड़ा असंतुलन आयेगा। इतना ही नहीं वैष्विक तापमान भी दुनिया समेत भारत की जल संकट की स्थिति को कठिन बनाने में मदद कर रहा है। परम्परागत जल स्रोतों की लगातार हो रही उपेक्षा जल संकट का बड़ा कारण है। जल संरक्षण के लिए वर्शा जल का संचय हेतु परम्परागत जल स्रोत कुएं और तालाब खत्म होने से रोकना साथ ही उन्हें जीवित भी करना होगा। प्राचीन काल में जल के लिए कुंआ सबसे बड़ा मुख्य साधन था, तालाब को प्राथमिकता दी जाती थी मगर अब ऐसे स्थान अधिग्रहण के षिकार हो गये। अतिक्रमण के चलते षहर के कई जल स्रोत अपना साक्ष्य खो चुके हैं। सौन्दर्यीकरण के नाम पर भी ऐसे प्रतीकों और जल संरक्षण के उपायों को ठोकर मार दिया गया। सभी को लगता है कि पानी देना सरकार का काम है जबकि सच्चाई यह है कि नदी, तालाब और कुंए पेयजल के परम्परागत और आधुनिक स्रोत रहें हैं। भूजल की स्थिति भी कराहने वाली है। जब जल के यह स्रोत खतरे में हों तो जीवन का खतरे में जाना तय है।
ऐसे स्रोतों के जीर्णोद्धार न होना संकट को न्यौता देने के बराबर है। गौरतलब है कि अति भूजल दोहन के चलते 72 फीसद जमीन पानी विहीन हो गयी है। जल संरक्षण व प्रबंधन की यह खामी सरकार और समाज दोनों पर प्रष्न खड़ा करता है। साल 2018 में नीति आयोग द्वारा किये गये अध्ययन से यह पता चला था कि 122 देषों की जल संकट की सूची में भारत 120वें स्थान पर था जबकि दुनिया के 400 षहरों में षीर्श 20 में चेन्नई, कोलकाता, मुम्बई और दिल्ली षामिल थे। समग्र जल प्रबंधन सूचकांक भी यह बताता है कि देष के 21 षहर जीरो ग्राउंड वाटर लेवल के कगार पर हैं जिसमें बंगलुरू, चेन्नई, दिल्ली और हैदराबाद जैसे अनेक षहर षुमार हैं। जाहिर है 10 करोड़ से अधिक आबादी इस जल संकट का सामना करेगी। नोएडा जैसे षहरों में भूजल 4 फीट प्रति वर्श की दर से कम हो रहा है। विष्व स्वास्थ संगठन की माने तो एक व्यक्ति अपनी जरूरत को पूरा करने में 25 लीटर पानी खपत करता है जबकि हकीकत यह है कि दिल्ली और मुम्बई जैसे महानगर में नगर निगम द्वारा निर्धारण 150 लीटर प्रति व्यक्ति से भी ज्यादा का पता चलता है।
एक क्षेत्र के अंतर्गत जल उपयोग की मांगों को पूरा करने के लिए उपलब्ध जल संसाधनों की कमी को जल संकट कहते हैं। दुनिया के सभी महाद्वीपों में रहने वाले लगभग 3 बिलियन लोग कम से कम एक महीने जल संकट से प्रभावित रहते हैं। हालांकि भारत के साथ चीन, दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका और आॅस्ट्रेलिया समेत कई अन्य देषों को भी उच्च जल तनाव का सामना करना पड़ सकता है। गौरतलब है कि मानसून की अस्थिरता, एलनीनो का प्रभाव जैसे कारक भी जल संकट को बढ़ावा देते हैं। लगातार जल का दुरूपयोग मसलन गाड़ी की धुलाई, नल की टोटी खुली छोड़ देना। सड़कों की धूल मारने और घर की साफ-सफाई में भी अनावष्यक खर्च भी इसकी बचत को कमजोर कर रहा है। धीरे-धीरे भूजल की निकासी की मात्रा में भी बढ़त हुई नतीजन जमीन खोखली होती जा रही है, भवन धंसते जा रहे हैं। इण्डोनेषिया के कुछ द्वीप भूजल में भारी कमी के चलते धस रहे हैं। खाद्य सुरक्षा, आर्थिक अस्थिरता, जैव विविधता की हानि आदि जल संकट के कारण सम्भव है। इतना ही नहीं कानून-व्यवस्था को भी जल संकट बिगाड़ सकता है। सतत् विकास लक्ष्य की परिपाटी को कैसे प्राप्त किया जाये यह लाख टके का सवाल है। रेनवाटर हार्वेस्टिंग द्वारा जल का संचयन और वर्शा जल को संग्रहीत करने के लिए तालाब और चेक डैम आदि की व्यवस्था साथ ही झीलों व नदियों को साफ रखने की कूबत भी दिखानी होगी।
आत्म अनुषासन स्वयं में विकसित एक ऐसी षिक्षा और जागरूकता है जो प्राकृतिक संसाधनों को सम्मान देने में मदद करता है। अब समय आ गया है कि जल को उसका वह सम्मान वापस दिया जाये। अन्यथा अस्तित्व पर खतरे के लिए तैयार रहना चाहिए। सुषासन के मामले में यह स्पश्ट है कि एक ऐसी संवेदनषील षासन व्यवस्था जो पारदर्षिता और जवाबदेहिता के साथ लोक सषक्तिकरण को अंजाम दे। ऐसे में पानी प्राथमिकता है क्योंकि पानी बिन सब सूना हो सकता है। जल संरक्षण के लिए पर्यावरण जरूरी है जब पर्यावरण बचेगा तो जल बचेगा। ऐसे में यहां पर भी व्याप्त असंतुलन को पाटा जाना चाहिए। ग्लेषियर का सिकुड़ना और पृथ्वी के तापमान का बढ़ने जैसे तमाम उपरोक्त संदर्भ भले ही पुरानी कहानी प्रतीत होते हों मगर यह रोजाना की दर से जल संकट की दास्तां लिख रहे हैं।

डाॅ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक

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