परिसंघीय ढांचे पर जीएसटी का प्रभाव

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परिसंघीय ढांचे पर जीएसटी का प्रभाव

देश  में कई सारे अप्रत्यक्ष करों को समाहित कर आज से ठीक 4 साल पहले 1 जुलाई 2017 को एक नया आर्थिक कानून वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू हुआ था। इस एकल कर व्यवस्था से राज्यों को होने वाले राजस्व कर की भरपाई हेतु पांच साल तक मुआवजा देने का प्रावधान भी इसमें षामिल था जिसके लिए एक कोश बनाया गया जिसका संग्रह 15 फीसद तक के सेस से होता है। गौरतलब है कि जीएसटी लागू होने से पहले ही केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच आपस में इस बात पर सहमति का प्रयास किया गया था कि इसके माध्यम से प्राप्त राजस्व में केन्द्र और राज्यों के बीच राजस्व का बंटवारा किस तरह किया जायेगा। ध्यानतव्य हो कि पहले इस तरह के राजस्व का वितरण वित्त आयोग की सिफारिषों के आधार पर किया जाता था। जीएसटी का एक महत्वपूर्ण संदर्भ यह रहा है कि इस प्रणाली के लागू होने से कई राज्य इस आषंका में षामिल रहे हैं कि इनकी आमदनी इससे कम हो सकती है और यह आषंका सही भी है। हालांकि ऐसी स्थिति से निपटने के लिए केन्द्र ने राज्यों को यह भरोसा दिलाया था कि साल 2022 तक उनके नुकसान की भरपाई की जायेगी। मगर पड़ताल यह बताती है कि बकाया निपटाने के मामले में केन्द्र सरकार पूरी तरह खरी नहीं उतर पा रही है। समझने वाली बात यह भी है कि पिछले साल दो लाख 35 हजार करोड़ रूपए की राजस्व कमी पर केन्द्र सरकार ने राज्यों को सुझाव दिया था कि वे इस कमी को पूरा करने के लिए उधार लें जिससे राज्यों में सहमति का अभाव देखा जा सकता है। इसी दौरान सरकार ने दो विकल्प सुझाये थे पहला यह कि राज्य सरकारें राजस्व की भरपाई हेतु कुल राजस्व का आधा उधार उठायेंगी और उसके मूल और ब्याज दोनों की अदायगी भविश्य में विलासिता वाली वस्तुओं और अवगुण वाली वस्तुओं पर लगाये जाने वाली क्षतिपूर्ति सेस से की जायेगी। दूसरा विकल्प यह था कि राज्य सरकारें पूरे नुकसान की राषि को उधार लेंगी लेकिन उस परिस्थिति में मूल की अदायगी को क्षतिपूर्ति सेस से की जायेगी मगर ब्याज के बड़े हिस्से की अदायगी उन्हें स्वयं करनी होगी। पहले विकल्प को बीजेपी षासित और उनके गठबंधन वाली सरकारों ने तो स्वीकार किया लेकिन षेश 10 राज्यों ने इसे खारिज किया।
पड़ताल यह बताती है कि वित्तीय सम्बंध के मामले में संघ और राज्य के बीच समय-समय पर कठिनाईयां आती रही हैं। सहकारी संघवाद के अनुकूल ढंाचा की जब भी बात होती है तो यह भरोसा बढ़ाने का प्रयास होता है कि समरसता का विकास हो। आरबीआई के पूर्व गर्वनर डी0 सुब्बाराव ने कहा था कि जिस प्रकार देष का आर्थिक केन्द्र राज्यों की ओर स्थानांतरित हो रहा है उसे देखते हुए इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि वर्तमान में भारत का आर्थिक विकास सहकारी संघवाद पर टिका देखा जा सकता है। गौरतलब है कि संघवाद अंग्रेजी षब्द फेडरेलिज़्म का हिन्दी अनुवाद है और इस षब्द की उत्पत्ति लैटिन भाशा से हुई है जिसका अर्थ समझौता या अनुबंध है। जीएसटी संघ और राज्य के बीच एक ऐसा अनुबंध है जिसे आर्थिक रूप से सहकारी संघवाद कहा जा सकता है मगर जब अनुबंध पूरे न पड़े तो विवाद का होना लाज़मी है। वित्तीय लेन-देन के मामले में अभी भी समस्या समाधान नहीं हुआ। जुलाई 2017 में पहली बार जब जीएसटी आया तब इस माह का राजस्व संग्रह 95 हजार करोड़ के आसपास था। धीरे-धीरे गिरावट के साथ यह 80 हजार करोड़ पर भी पहुंचा था और यह उतार-चढ़ाव चलता रहा। जीएसटी को पूरे 4 साल हो गये मगर इन 48 महीनों में बहुत कम अवसर रहे जब यह 1 लाख करोड़ रूपए के आंकड़े को पार किया। कोविड-19 महामारी के चलते अप्रैल 2020 में इसका संग्रह 32 हजार करोड़ तक आकर सिमट गया जबकि दूसरी लहर के बीच अप्रैल 2021 में यह आंकड़ा एक लाख 41 हजार करोड़ का है जो पूरे 4 साल में सर्वाधिक है। हालांकि बीते 8 महीने से जीएसटी का संग्रह एक लाख करोड़ से अधिक का बना हुआ है। मगर जून 2021 में यह 93 हजार पर सिमट गया। एक दौर ऐसा भी था कि दिसम्बर 2019 तक पूरे 30 महीने के दरमियान सिर्फ 9 बार ही अवसर ऐसा था जब जीएसटी का संग्रह एक लाख करोड़ से अधिक हुआ था। जब जीएसटी षुरू हुआ था तब करदाता 66 लाख से थोड़े अधिक थे और आज यह संख्या सवा करोड़ से अधिक हो गयी है।
जीएसटी के इस चार साल के कालखण्ड में जीएसटी काउंसिल की 44 बैठकें और हजार से अधिक संषोधन हो चुके हैं। कुछ पुराने संदर्भ को पीछे छोड़ा जाता है तो कुछ नये को आगे जोड़ने की परम्परा अभी भी जारी है। संघ और राज्य के वित्तीय मामलों में संवैधानिक प्रावधान को भी समझना यहां ठीक रहेगा। अनुच्छेद 275 संसद को इस बात का अधिकार प्रदान करता है कि वह ऐसे राज्यों को उपयुक्त अनुदान देने का अनुबंध कर सकती है जिन्हें संसद की दृश्टि में सहायता की आवष्यकता है। अनुच्छेद 286, 287, 288 और 289 में केन्द्र तथा राज्य सरकारों को एक दूसरे द्वारा कुछ वस्तुओं पर कर लगाने से मना किया गया है। अनुच्छेद 292 व 293 क्रमषः संघ और राज्य सरकारों से ऋण लेने का प्रावधान भी करते हैं। गौरतलब है कि संघ और राज्य के बीच षक्तियों का बंटवारा है संविधान की 7वीं अनुसूची में संघ, राज्य और समवर्ती सूची के अंतर्गत इसे बाकायदा देखा जा सकता है। जीएसटी वन नेषन, वन टैक्स की थ्योरी पर आधारित है जो एकल अप्रत्यक्ष कर संग्रह व्यवस्था है। जिसमें संघ और राज्य आधी-आधी हिस्सेदारी रखते हैं। 80वें संविधान संषोधन अधिनियम 2000 और 88वें संविधान संषोधन अधिनियम 2003 द्वारा केन्द्र-राज्य के बीच कर राजस्व बंटवारे की योजना पर व्यापक परिवर्तन दषकों पहले किया गया था जिसमें अनुच्छेद 268डी जोड़ा गया जो सेवा कर से सम्बंधित था। बाद में 101वें संविधान संषोधन द्वारा नये अनुच्छेद 246ए, 269ए और 279ए को षामिल किया गया तथा अनुच्छेद 268 को समाप्त कर दिया गया। गौरतलब है राज्य व्यापार के मामले में कर की वसूली अनुच्छेद 269ए के तहत केन्द्र सरकार द्वारा की जाती है जबकि बाद में इसे राज्यों को बांट दिया जाता है। जीएसटी केन्द्र और राज्य के बीच झगड़े की एक बड़ी वजह उसका एकाधिकार होना भी है। क्षतिपूर्ति न होने के मामले में तो राज्य केन्द्र के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक जाने की बात कह चुके हैं। काफी हद तक इसे जीएसटी को महंगाई का कारण भी राज्य मानते हैं। सवाल यह भी है कि वन नेषन, वन टैक्स वाला जीएसटी जब अभी वायदे राज्यों से किये गये वायदे पर पूरी तरह खरा नहीं उतर रहा है तो 2022 के बाद क्या होगा जब क्षतिपूर्ति देने की जिम्मेदारी से केन्द्र मुक्त हो जायेगा। समझने वाल बात यह भी है कि जीएसटी के नफे-नुकसान में राज्य कहां खड़े हैं और इसमें व्याप्त कठिनाईयों को लेकर केन्द्र कितना दबाव लेता है। फिलहाल जीएसटी में उगाही भले ही एक बेहतर अवस्था को प्राप्त कर ले मगर समय के साथ राज्यों को घाटा होता है तो तनाव का घटाव मुष्किल ही रहेगा।

डाॅ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक

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