महामारी का दौर और गांधीवाद

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महामारी का दौर और गांधीवाद

महामारी को पूरी तरह काबू में करने के लिए जब यह सुनिष्चित हो गया कि लाॅकडाउन ही अन्तिम विकल्प है साथ ही लोग घर में रहें और सुरक्षित रहें तभी जीवन यापन से जुड़े हालात भी मुखर हो गये थे। हालांकि सरकार ने 80 करोड़ लोगों को 5 किलो अनाज देने और 20 लाख करोड़ रूपए के आर्थिक पैकेज की घोशणा कर दी थी। मगर हालात कितने सुधरे यह पड़ताल का विशय है। कोविड-19 जैसी महामारी का सबसे भयानक लक्षण इसका अनिष्चित होना है। इसकी बार-बार की उपस्थिति सभ्यता के लिए न केवल चुनौती है बल्कि असमय आम जन मानस को जान से भी हाथ धोना पड़ रहा है। जब सामाजिक-आर्थिक प्रणालियां अपनी सतत् व्यवस्था से बेपटरी हो जायें तो बदलाव की एक नई गुंजाइष जन्म लेती है। आत्मनिर्भर भारत इसी कड़ी में उदित एक ऐसी व्यवस्था है जो महामारी के बीच उम्मीदों के बोझ से दबी है। अधिक निरंतरता लाने में संलग्न किसी भी प्रयास की भावना गांधीवादी चिंतन है। जो हालात मौजूदा परिस्थिति में हैं वह समुचित विष्व को संकट की ओर धकेल दिया है। परिस्थितियों की इस विकटता को देखें तो मानवीय प्रबंधन स्वयं का एक दक्ष विशय बन गया है। जब विकल्प कम हो जायें तब आत्मनिर्भर होने का पथ चिकना करना पड़ता है। गांधी का दृश्टिकोण ऐसे रास्तों से मेल खाता है।
सरकार की व्यवस्था कैसी है और जनता के लिए कितनी कारगर है यह प्रष्न कहीं गया नहीं है और इस प्रष्न से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि महामारी के चलते षायद न केवल मनोदषा बल्कि जीवन दर्षन में भी फेरबदल हुआ है। गांधी ने इच्छाओं पर नियंत्रण की बात खूब कही है। अहिंसा के साथ सत्य का प्रयोग भी उनके सिद्धांतों में रचा-बसा है। गांधीवादी अर्थषास्त्र पर नजर डालें तो पृथ्वी आवष्यकता तो पूरी कर सकती है मगर लालच को नहीं। महामारी ने लोगों को जिस तरह उनकी आवष्यकता की पूर्ति हेतु जोर से धक्का दिया है उसमें लालच चकनाचूर हुआ है। साल 1922 का गांधी दर्षन सर्वोदय 2021 में कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। सभी के उदय से युक्त कामना की यह विचारधारा गांधी दर्षन का एक निचोड़ भी है जिसका मूर्त रूप 26 जनवरी 1950 को लागू संविधान के भाग 4 में निहित नीति-निदेषक तत्व में देखा जा सकता है। वैसे वक्त कैसा भी हो गांधी दृश्टिकोण प्रासंगिक हमेषा ही रहा है मगर जब बात महामारी की हो तब यही विचारधारा तुलनात्मक और बड़ी बन जाती है। फिलहाल हालात यह हैं कि रोज़मर्रा की आवष्यकता के लिए करोड़ों जद्दोजहद में लगे हैं। जिस तरह कमाई खतरे में पड़ी है वह गरीबी को बड़ा स्तर देने की ओर है। मौजूदा आंकड़ा तो कहता है कि देष में हर चैथा व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे है और इतना ही अषिक्षित भी। सम्भव है कि महामारी ने गरीबी की मात्रा बढ़ाया ही होगा। प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट से तो सरसरी तौर पर तो यही पता चलता है कि महामारी ने करीब 3 करोड़ मध्यम आय वर्ग वालों को निम्न आय वर्ग की ओर धकेल दिया है और जबकि निम्न आय वर्ग के करोड़ों लोग गरीबी की ओर गतिमान कर चुके हैं। गौरतलब है कि प्रतिदिन 1.9 डाॅलर से कम कमाई पर गरीबी निर्धारित की गयी और 10 डाॅलर से अधिक में मध्यम आय वर्ग वाले आते हैं जबकि इन दोनों के बीच निम्न आय वर्ग होता है। यदि यही कमाई 50 डाॅलर या उससे अधिक प्रतिदिन के हिसाब से हो जाये तो यह उच्च आय वर्ग को दर्षाता है।
चुनौती कहां है इसे ढूंढने के काम को भी कमतर नहीं आंक सकते। असल में महामारी के चलते जिस तादाद में पलायन हुआ वहां रोज़गार और जीवन की परिस्थिति खोजना, घटती कमाई के बीच बढ़ते अपराध से निपटना, दस्तकारी, षिल्पकारी और ग्रामीण सांस्कृतिक परिवेष में निहित उन पुराने रोजगार के संरचनात्मक और प्रक्रियात्मक दृश्टिकोण को उभारना आदि की प्रबल संभावना उजागार हुई है। इसके अलावा खाद्य प्रसंस्करण जैसी कृशि आधारित और सम्बंधित व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा देना। ग्रामीण महिलाओं को प्रषिक्षण के माध्यम से सजग बनाते हुए आत्मनिर्भर बनाने के साथ देष की जीडीपी में योगदान देना। गौरतलब है कि विष्व बैंक ने बरसों पहले कहा है कि यदि भारत की महिलाओं को रोज़गार से जोड़ा जाये तो देष की जीडीपी 4 प्रतिषत और बढ़त ले लेगी। ध्यानतव्य हो महामारी अभी भी जारी है वापस लौटे प्रवासियों का प्रयोग गांधीवादी दर्षन से ही सम्भव है। बुनियादी ढांचे में सुधार, बैद्धिक सम्पदा का निर्माण, पारिस्थितिकी के अनुपात में एमएसएमई स्थापित करने मसलन कृशि एवं गैर कृशि से जुड़े रोज़गार को बढ़ावा देना साथ ही सम्मानजनक जीवन को बड़ा करना गांधी विचारधारा से ही सम्भव है। जिसमें पर्यावरण का सरोकार, सतत् विकास के साथ समावेषी दृश्टिकोण की संलग्नता हो। जाहिर है इन तमाम की उपादेयता और सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन कम से कम ऐसे दौर में गांधी दर्षन में ही निहित हैं।

डाॅ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक

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