संसद के भीतर भी हो सुशासन

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संसद के भीतर भी हो सुशासन

लोकतंत्र की धारा से जनता के हित पोशित होते है जाहिर है जितने सवाल होंगे उतने ही खूबसूरती से जवाब और जवाबदेही बढ़ेगी। इससे न केवल संसद के प्रति जनता का भरोसा बढ़ेगा बल्कि माननीय भी कुछ करते दिखाई देंगे। गौरतलब है कि इन दिनों देष की सबसे बड़ी पंचायत का मानसून सत्र जारी है जो देष की उम्मीदों पर कितना खरा उतरेगा ये सत्र बीत जाने के पष्चात् पता चलेगा। जिस कदर संसद में हो-हल्ला हो रहा है उसे देखते हुए लगता है कि हंगामे से यह मानसून सत्र तर-बतर रहेगा। हालांकि इस बात का पहले ही अंदाजा था कि संसद में कई मुद्दों पर संग्राम के आसार रहेंगे। संसद के भीतर सब कुछ अच्छा हो इसे देखते हुए हमेषा सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक बुलाई जाती है। ऐसा इस बार भी हुआ जब 18 जुलाई को सत्र के एक दिन पहले सर्वदलीय बैठक बुलाई गयी। रोचक यह है कि बैठक के बाद विपक्षी दलों ने अलग बैठक कर संसद में सरकार को घेरने की रणनीति बनायी। गौरतलब है पेट्रेाल और डीजल की बढ़ती कीमत से जनता कराह रही है, महंगाई भी एक मुद्दा है और पिछले 8 महीने से किसान आंदोलनरत् हैं और नतीजे ढाक के तीन पात हैं। अब वही किसान जंतर-मंतर पर किसान संसद के रूप में अपना सत्र चलाये हुए हैं। इसके अलावा फोन हैकिंग का मामले ने तो संसद में संग्राम ही छेड़ दिया है। हालांकि यह घटना संविधान में निहित निजता के अधिकार का भी उल्लंघन करती है। देखा जाये तो विपक्ष और सरकार के बीच दो-दो हाथ होना पहले से ही तय माना जा रहा था जो होता दिख भी रहा है। टीएमसी के एक सांसद द्वारा राज्यसभा में पर्चा फाड़ कर उपसभापति के ऊपर फेंकना इसी हंगामे का एक बड़ा स्वरूप है जिस पर विषेशाधिकार के अंतर्गत कार्यवाही करने की चर्चा है। दूसरी लहर में कोई भी कोरोना पीड़ित आॅक्सीजन की कमी से नहीं मरा यह बात भी सरकार की ओर से स्पश्ट की गयी है। इस मामले को लेकर भी विपक्ष और षायद जनता में भी एक भ्रम ही फैल गया है। गौरतलब है कि अप्रैल और मई के महीने में दूसरी लहर ने कहर ढाया और हमारी चिकित्सीय व्यवस्था चरमरा गयी मगर आॅक्सीजन की कमी नहीं हुई यह बात मानसून सत्र में पता चल रही है।
यहां एक बात समझ लेना बहुत जरूरी है कि यदि लोकतंत्र के भीतर भेदभाव की लकीरें खींची जायेंगी तो संकट देष पर ही आयेगा। 19 जुलाई से षुरू मानसून सत्र 13 अगस्त तक जारी रहेगा। सरकार की यह कोषिष रहेगी कि कई बकाये विधेयक कानून का रूप लें और इस सत्र को एक मजबूत रूप देने के लिए कई नये विधेयक को कानूनी अमलीजामा दिया जाये। वैसे सरकार ने कहा है कि वह सभी मुद्दों पर बातचीत के लिए तैयार है सरकार की कोषिष है कि 13 अगस्त तक चलने वाले सत्र के दौरान कमोबेष 20 बिल पारित करवाये जायें। एक तरफ संसद में कई उम्मीदों को अवसर देने का प्रयास है तो दूसरी ओर प्रदर्षनकारी किसान भी अपनी तैयारी में जुटे हैं। किसानों का कहना है कि जब तक संसद का यह सत्र चलेगा तब तक प्रदर्षन करेंगे। मानसून सत्र का एक सप्ताह बीतने के बाद में आषा के अनुरूप कुछ होता दिखाई नहीं दिया। बावजूद इसके काम कितना हुआ यह पड़ताल का विशय है। कहा जाये तो संसद राजनीतिक आजमाइष का मंच बना हुआ है। कूबत और कद की लड़ाई में मानसून सत्र भी मानो सावन का सामना कर रहा है। विधेयक की सूची पर एक नजर डाली जाये तो दिवाला और दिवालियापन संहिता (संषोधन) विधेयक, 2021, सीमित देवता भागीदारी (संषोधन) विधेयक, 2021, पेंषन फंड नियामक और विकास प्राधिकरण (संषोधन) बिल, 2021, जमा बीमा और ऋण गारंटी निगम (संषोधन) विधेयक, 2021, आवष्यक रक्षा सेवा विधेयक,2021-अध्यादेष की जगह लेगा, छावनी विधेयक, 2021, भारतीय अंटार्कटिका बिल, 2021 आदि हो सकते हैं। इसके अलावा कुछ अहम बिल भी और देखे जा सकते हैं मसलन पेट्रोलियम और खनिज पाइपलाइन (संषोधन) विधेयक, 2021, बिजली (संषोधन) विधेयक, 2021, व्यक्तियों की तस्करी (रोकथाम और पुनर्वास) विधेयक, 2021 और कुछ अन्य विधेयकों को भी सूचीबद्ध किया है। गौरतलब है सरकार ने संसद के मानसून सत्र में पेष करने के लिए 17 नये विधेयकों को सूचीबद्ध किया है।
कामकाज के लिहाज से देखा जाय तो पहली लोकसभा (1952 से 1957) में 677 बैठकें हुई थी। 5वीं लोकसभा (1971 से 1977) में 613 जबकि 10वीं लोकसभा (1991 से 1996 ) में यह औसत 423 का था। मोदी षासनकाल से पहले 15वीं लोकसभा (2009 से 2014) में 345 दिन ही सदन की बैठक हो पायी। 16वीं लोकसभा की पड़ताल ये बताती है कि यहां बैठकों की कुल अवधि 1615 घण्टे रही लेकिन अतीत की कई लोकसभा के मुकाबले यह घण्टे काफी कम नजर आते हैं। एक दल के बहुमत वाली अन्य सरकारों के कार्यकाल के दौरान सदन में औसत 2689 घण्टे काम में बिताये हैं लेकिन यहां बताना लाज़मी है कि काम इन घण्टों से ज्यादा महत्वपूर्ण है। हालांकि 16वीं लोकसभा में किस तरह काम किया, किस तरह के कानून बनाये, संसदीय लोकतंत्र में कैसी भूमिका थी, क्या सक्रियता रही और लोकतंत्र के प्रति सरकार का क्या नजरिया रहा इन सवालों पर यदि ठीके से रोषनी डाली जाये तो काम के साथ निराषा भी नजर आती है। लोकसभा के उपलब्ध आंकड़े यह बताते हैं कि मोदी षासन के पहले कार्यकाल के दौरान लोकसभा में कुल 135 विधेयक मंजूर कराये गये। जिसमें कईयों को राज्यसभा में मंजूरी नहीं मिली। हालांकि जीएसटी, तीन तलाक और सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण समेत कई फलक वाले कानून इसी कार्यकाल की देन है। अब 17वीं लोकसभा का दौर जारी है। रिपोर्ट 2024 में मिलेगा। यह दौर कोरोना काल का है और आर्थिक मन्दी का भी साथ ही बेरोजगारी भी सारे रिकाॅर्ड तोड़ चुकी है। बजट से लेकर तमाम आर्थिक पैकेज के बावजूद भी स्थितियं अभी काबू में नहीं हैं। विकास दर धूल चाट रही है और समस्याओं का अम्बार लगा हुआ है। सबके बावजूद सियासी गुणा-भाग की चिंता से सरकार उबर नहीं पा रही है। मिला-जुलाकर देखा जाय तो संसद में जहां आरोपों की झड़ी लगती है वहीं भावनात्मक स्थितियां उभार कर जनता के मानसपटल को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया जाता है। जबकि हकीकत में सरकार माई-बाप होती है उसे हर मिनट का हिसाब जनता के हित में खर्च करना चाहिए।
प्रधानमंत्री मोदी कहते रहे हैं कि अच्छे दिन आने वाले हैं पर संसद के बुरे दिन न आये इसकी भी चिंता करने का वक्त है। कोरोना काल में संसद सत्र को लेकर भी दिन बहुत कम ही अच्छे रहे हैं। अब मौजूदा मानसून सत्र देष के हित में समर्पित कर यदि अच्छे नतीजे में बदल दिया जाये तो कुछ कोर-कसर पूरी की जा सकती है। संसद भवन में भी सुषासन हो, सुचिता हो और गरीबी, निरक्षरता, षिक्षा और चिकित्सा सहित बेरोजगारी की समस्या से मुक्ति वाली गूंज उठे इसकी फिक्र पक्ष हो या विपक्ष सभी को होनी चाहिए। वास्तव में यह सरकार और विपक्ष के लिए यक्ष प्रष्न बन चुका है कि सामाजिक-आर्थिक नियोजन की कमजोर दषा के लिए उत्तरदायी कौन है। लड़ाई सियासत की है पर सरेआम मत कीजिए। लोकतंत्र को कश्ट होता है और जनता में अविष्वास पनपता है। संसद निजीपन की षिकार नहीं होनी चाहिए। 16वीं लोकसभा में कांग्रेस 44 पर थी और अब 52 में सिमट कर रह गयी है जबकि मौजूदा सरकार पहले भी गठबंधन समेत 300 के पार थी और अब तो भाजपा अकेले ही इस आंकड़े को छुआ है जाहिर है ताकत के साथ और मजबूती आयी है। फिलहाल संसद को पक्ष और विपक्ष दोनों चाहिए। देष को सीख देने वाले सियासतदान भटकाव से बचते हुए उन कृत्यों को अंगीकृत करें जहां से देष की भलाई की गंगा बहती हो न कि भ्रम की।

 

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